भारतीय राजनीति और शासन
Indian Polity and Governance

This Page is Under Development!
Learn More!

राजनीतिक व्यवस्था एक सामाजिक संस्था है जो किसी देश के शासन से संव्यवहार करती है और लोगों से इसका संबंध प्रकट करती है। राजनितिक कुछ मूलभूत सिद्धांतों का समुच्चय है जिसके इर्द-गिर्द राजनीति और राजनीतिक संस्थान विकसित होते हैं या देश को शासित करने हेतु संगठित होते हैं। राजनीतिक व्यवस्था में ऐसे तरीके भी शामिल होते हैं जिसके अंतर्गत शासक चुने या निर्वाचित होते हैं, सरकारों का निर्माण होता है तथा राजनीतिक निर्णय लिए जाते हैं। समाज में राजनीतिक पारस्परिक विमर्श तथा निर्णय-निर्माण की संरचना एवं प्रक्रिया सभी देशों की राजनीतिक व्यवस्था में समाहित होते हैं। व्यक्ति की बहुविध जरूरतों की पूर्ति हेतु राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण हुआ है।

संविधानवाद की अवधारणा एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था है जो एक संविधान के अंतर्गत शासित होती है और जो आवश्यक रूप से सीमित सरकार और कानून के शासन को प्रतिबिम्बित करती है तथा एक मध्यस्थ, कुलीतंत्रीय, निरंकुश तथा अधिनायकवादी व्यवस्था के विपरीत होती है। किसी देश का संविधान राजनीतिक व्यवस्था के आधारभूत ढांचे की स्थापना करता है जिसके द्वारा लोग शासित होते हैं। यह विभिन्न अंगों-विधानमण्डल, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका की स्थापना के साथ-साथ उनकी शक्तियों, जिम्मेदारियों एवं उनके एक-दूसरे के साथ और लोगों के साथ संबंधों को विनियमित करती है। इसलिए संवैधानिक सरकार लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के लिए अपरिहार्य है।

सरकार के प्रकार का वर्गीकरण एक देश की शासन व्यवस्था की शक्ति संरचना की सामान्य तस्वीर पेश करता है। विश्व में विभिन्न प्रकार की शासन व्यवस्था हैं जो एक-दूसरे से भिन्न हैं। विभिन्न प्रकार की सरकारें विभिन्न प्रकार की राजनीतिक व्यवस्था को अंगीकृत किए हुए हैं। विभिन्न प्रकार की सरकारों का अंतर्गत- एकात्मक, संघात्मक, लोकतांत्रिक, कुलीनतंत्रीय एवं अधिनायकवादी इत्यादि आती हैं। जहां एक ओर एकात्मक सरकार में सभी शक्तियां एक केंद्रीय प्राधिकारी में निहित होती हैं तथा देश की सभी स्थानीय अधीनस्थ इसके एजेंट के रूप में काम करते हैं। यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस एवं न्यूजीलैण्ड एकात्मक शासन व्यवस्था के उदाहरण हैं। वहीं दूसरी ओर संघात्मक व्यवस्था में कठोर एवं लिखित शासन होता है। इसमें संविधान द्वारा विधायी एवं कार्यपालिका शक्तियों का स्पष्ट विभाजन विभिन्न अंगों को किया जाता है।

एक अधिनायकवादी या निरंकुश सरकार में लोगों को राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल किए बिना तथा उनकी सहमति लिए बगैर फैसले लिए जाते हैं। अधिनायकवादी राजव्यवस्था का आधार, असहमति के प्रति असहिष्णुता एवं शासक हमेशा सही होने की अवधारणा है। एक संपूर्ण राजतांत्रिक व्यवस्था सामान्यतः वंशानुगत होती है। वर्तमान समय में कई देशों- यूनाइटेड किंगडम, स्वीडन, नार्वे, बेल्जियम, जापान, थाइलैण्ड, डेनमार्क, नीदरलैण्ड, स्पेन एवं मोनाको आदि में वंशानुगत शासक है, जो केवल संवैधानिक राष्ट्राध्यक्ष हैं जबकि वास्तविक शक्तियां जन-प्रतिनिधियों को हस्तांतरित की गयी है। हालाँकि कुछ राज्य हैं जहाँ सम्पूर्ण राजतांत्रिक व्यवस्था है और यह अधिनायकवादी शासन व्यवस्था की तरह ही होती है। इसके अतिरिक्त संसदीय शासन व्यवस्था, अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था, लोकतांत्रिक वुय्वस्था, अध्यक्षात्मक संसदीय व्यवस्था इत्यादि भी होती हैं।

भारत के संविधान में, जापान के संविधान के विपरीत, जहाँ कोई संविधान संशोधन नहीं हुआ है, अत्यधिक संविधान संशोधन किए गए हैं। अभी तक 100 संविधान संशोधन (जून 2015 तक) किए जा चुके हैं। उल्लेखनीय है कि भारत के संविधान की कई विशेषताएं हैं जैसे, लिखित एवं विशाल संविधान, संसदीय प्रभुता एवं न्यायिक सर्वोच्चता में समन्वय, संसदीय शासन प्रणाली, नम्यता एवं अनम्यता का समन्वय, विश्व के प्रमुख संविधानों का प्रभाव, ऐकिकता की ओर उन्मुख परिसंघ प्रणाली, सत्र्व्जनिक मताधिकार, धर्मनिरपेक्षता, समाजवादी राज्य, स्वतंत्र न्यायपालिका, इत्यादि।

भारत,राज्यों का संघ,एक प्रभुसतासंपन्न, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य है, जिसमें शासन की संसदीय व्यवस्था है। भारतीय राजव्यवस्था संविधान के संदर्भ में शासित होती है, जिसे 26 नवम्बर, 1949 को संविधान सभा द्वारा स्वीकार किया गया और 26 जनवरी, 1950 की प्रवृत्त किया गया। अमेरिका एवं ब्रिटिश राजनीतिक व्यवस्था की तरह, जो सदियों से अपने वर्तमान रूप में मौजूद है, भारतीय राजनीतिक व्यवस्था ब्रिटेन से 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति और 1950 में भारत के संविधान की उद्घोषणा के पश्चात् स्थापित हुई।

भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में, राष्ट्रपति को कार्यपालिका का संवैधानिक अध्यक्ष बनाया गया है, जबकि वास्तविक कार्यकारी शक्ति प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद् में है। इसी प्रकार राज्यों में राज्यपाल राष्ट्रपति का प्रतिनिधि होता है। संविधान विधायी शक्ति को संसद एवं राज्य विधानमंडलों में बांटता है। संसद को संविधान संशोधन की शक्ति दी गई है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के अनुसार संसद संविधान के आधारिक लक्षणों में संशोधन नहीं कर सकती।

हमारे संविधान में वर्णित आर्थिक, सामाजिक एवं राजनितिक स्वतंत्रता एवं न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए शासन एवं सु-शासन का अत्यधिक एवं विशिष्ट उत्तरदायित्व है। भारत में प्रशासनिक सुधार के इतने सारे प्रयासों के बावजूद भी प्रशासन के बुनियादी ढांचे और कार्य करने की प्रक्रियाओं में मूलभूत अंतर नहीं आ पाया है। इसके लिए पुरातन एवं अनावश्यक घिसी-पिटी प्रक्रियाओं को बदलना होगा, नौकरशाही की मनोवृत्तियों को बदलकर उसे उद्देश्यपरक बनाना होगा तथा साथ ही समग्र एवं समावेशी प्रयत्न करने होंगे।

भारत में सु-शासन के प्रयास में सूचना क्रांति ने एक शक्तिशाली उपकरण का कार्य किया है। ज्ञातव्य है कि भारत सूचना प्रौद्योगिकी क्षमता में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। ई-प्रशासन, ई-शिक्षा, ई-व्यापार, ई-वाणिज्य, ई-मेडिसिन आदि अन्य ऐसे कई क्षेत्र हैंजहां सूचना प्रौद्योगिकी की प्रभावशाली भूमिका में महत्वपूर्ण प्रगति देखी जा सकती है। ई-गवर्नेस के अंतर्गत सरकारी सेवाएं एवं सूचनाएं पहुंचाने में विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक विधियों एवं उपकरणों का प्रयोग किया जाता है। ई.प्रशासन के माध्यम से शासन को सरल, नागरिकोन्मुख, पारदर्शी, जवाबदेह एवं त्वरित बनाया जा सकता है।

Note : Some contents on this blog is taken from various website(s), books and based on personal experience for the purpose of spreading knowledge and to help people finding solutions they are looking for. We do not allow readers to violate any copyright law like to sell or distribute for business purpose. They are allowed to Read, Share and Print the document. However we are giving credit to websites from where some of content is used by us. You can find list of websites in the link : Source Credit


Milan Anshuman is a travel blogger with proficiency in nature and wildlife photography. Apart from this he loves to write article for technology, food, education, graphic & web design.

Want to be Featured?

Submit your Article